डॉ. इन्द्रेश मिश्रा
राजनीति के द्वारा प्राप्त संवैधानिक पद सिर्फ और सिर्फ पार्टीगत चुनाव प्रचार के लिए होता जा रहा है, न कि पद की जिम्मेदारियों के निर्वहन हेतु यह कितना उचित है सोचने वाली बात है। जबकि यही पक्ष-विपक्ष के विधान निर्माता संविधान की शपथ लेते समय जाति, धर्म-सम्प्रदाय से परे हटकर देशहित को सर्वोपरि रखते है।कुल मिलाकर देश सेवा भी पार्ट टाइम जॉब की तरह हो गई है, जहां प्रोटोकॉल के नाम पर सरकारी संसाधनों का भरपूर दोहन करते हुये पूरी मस्ती और दबंगई करते हुए पूरा समय पार्टी के लिये देना वहीं बचा हुआ समय देश हित में एहसास करते हुये कुर्बान करना। साथ ही इसी कुर्बानी का जोर-शोर से प्रचार करना।
इस मुहिम में विपक्ष के मुख्यमंत्रियों से लेकर, सत्तापक्ष के प्रधानमंत्री और दोनों पक्षों की कैबिनेट सहित प्रोटोकॉली तक बड़ी तल्लीनता से लगे हुये है।
इन नेताओं के आवागमन, सुरक्षा व्यवस्था आदि के लिये जनता के टैक्स से भरे हुये सरकारी खजाने से भारी भरकम खर्च किया जा रहा है। उद्देश्य मात्र एक, देशहित बाद में- पार्टी हित पहले।
होना क्या चाहिये! सत्ताधारी पार्टी के सदस्य के संवैधानिक पद पर होने पर उसके द्वारा पार्टीगत कार्यों पर पूर्णतः रोक लगाने हेतु सर्वसम्मति से कानून बनाया जाना चाहिये।
यदि पार्टी का कार्य करना आवश्यक हो तो संवैधानिक पद से त्यागपत्र ले लिया जाये या उस दौरान पदमुक्त करने का प्रावधान बनाया जाये।
जिस समय तक प्रचार-प्रसार या पार्टीगत कोई अन्य कार्य लिया जाये तो उस दौरान पद से कुछ समय के लिए पदच्युत होकर , समय विशेष के उपरांत पुनः पद धारण करने का भी प्रावधान हो सके तो पार्टीहित में और सर्वस्वीकार्य हो सकता है। हां, इस दौरान सत्ताधारी पार्टी का सर्वमान्य सदस्य संवैधानिक पद धारण करे।